
पश्चिम बंगाल में इस साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले ही राजनीति उबाल पर है। जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे केंद्रीय एजेंसियों की एंट्री और सियासी बयानबाज़ी ने माहौल को और गर्म कर दिया है।
बीते दिन प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) से जुड़े राजनीतिक रणनीतिकार समूह I-PAC के कोलकाता स्थित ऑफिस पर छापा मारा। इसके साथ ही कंपनी के निदेशक प्रतीक जैन के ठिकानों पर भी तलाशी ली गई।
इस कार्रवाई के तुरंत बाद बंगाल की राजनीति में हड़कंप मच गया।
ED Raid पर ममता बनर्जी का बड़ा हमला
ED की रेड के खिलाफ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद सड़क पर उतर आईं। शुक्रवार को कोलकाता में एक विशाल रैली को संबोधित करते हुए ममता ने केंद्र सरकार पर राजनीतिक बदले की कार्रवाई का आरोप लगाया।
ममता ने कहा कि “चुनाव से पहले केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह लोकतंत्र नहीं, डराने की राजनीति है।”
“मेरे पास पेन ड्राइव है…” – अमित शाह को सीधी चेतावनी
रैली के दौरान ममता बनर्जी ने जो कहा, उसने सियासी गलियारों में भूकंप ला दिया। उन्होंने दावा किया कि उनके पास एक पेन ड्राइव है, जिसमें कथित तौर पर कोयला घोटाले में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की संलिप्तता से जुड़े सबूत मौजूद हैं।
ममता ने तीखे अंदाज़ में कहा—
“मैं जिस कुर्सी पर बैठी हूं, उसकी गरिमा के कारण चुप हूं। लेकिन ज्यादा दबाव डाला गया तो सब सामने आ जाएगा। पूरा देश हैरान रह जाएगा।”
यह बयान आते ही BJP और TMC के बीच टकराव ओपन वॉर में बदल गया।

“दिल्ली तक गया कोयले का पैसा” – ममता का आरोप
मुख्यमंत्री ने आगे दावा किया कि कोयला घोटाले का पैसा दिल्ली में बैठे BJP के बड़े नेताओं तक पहुंचा, ज़रूरत पड़ी तो जनता के सामने सबूत रखे जाएंगे।
उन्होंने साफ कहा कि यह लड़ाई सिर्फ TMC की नहीं, बल्कि बंगाल की अस्मिता की है।
“जनता ही देगी जवाब” – चुनावी संदेश साफ
ममता बनर्जी ने ED की कार्रवाई को राजनीति से प्रेरित बताते हुए कहा कि इसका जवाब जनता वोट के ज़रिए देगी।
“ये विरोध अन्याय और अपमान के खिलाफ है। बंगाल झुकेगा नहीं।”
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ममता का यह बयान BJP के खिलाफ नैरेटिव सेट करने की रणनीति का हिस्सा है, जिससे चुनावी मैदान में सीधा असर पड़ सकता है।
ED की रेड हो, या पेन ड्राइव का ज़िक्र— बंगाल में चुनाव अब पोस्टर से नहीं, प्रेस कॉन्फ्रेंस और रेड से लड़ा जा रहा है। एक तरफ “कानून अपना काम कर रहा है” का दावा, दूसरी तरफ “लोकतंत्र खतरे में है” का शोर।
सवाल बस इतना है— पेन ड्राइव खुलेगी या सिर्फ सियासी धमकी बनकर रह जाएगी? जनता किस पर भरोसा करेगी—एजेंसी या आक्रोश?
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